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  • * IAS दीपक रावत ने संभाला ऊर्जा निगम और पिटकुल के प्रबंध निदेशक का पदभार.
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ईद-उज-जुहा समर्पण, त्याग और बलिदान का प्रतीक 

धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया ईद-उज-जुहा का पर्व 
भाईचारे और सौहार्दपूर्ण माहौल में ईद की नमाज़ अता 
जनपद के सभी थाना क्षेत्रों में सकुशल रूप से सम्पन्न हुई ईद की नमाज
देहरादून। उत्तराखंड राज्य की राजधानी देहरादून मे ईदुल जुहा का पर्व धार्मिक आस्था और श्रद्धा के साथ मनाया गया। ईद-उज-जुहा समर्पण, त्याग और बलिदान का प्रतीक है। यह पर्व मानवता की सेवा, विशेष रूप से वंचित वर्गों की सहायता करने के लिए प्रेरित करता है। पर्व को शांतिपूर्ण तरीके से सौहार्दपूर्ण माहौल में संपन्न कराने के लिए पुलिस द्वारा सभी थाना क्षेत्रों में स्थित धार्मिक स्थलों में लगातार भ्रमणसील रहकर सतर्क दृष्टि रखी गई। संपूर्ण जनपद में ईद-उल-जुहा का पर्व शांतिपूर्ण ढंग से मनाया गया। ईद के पर्व की दृष्टिगत एसएसपी देहरादून के निर्देशों पर संपूर्ण जनपद में सुरक्षा के समुचित प्रबंध सुनिश्चित किए गए थे, साथ ही मिश्रित आबादी क्षेत्र व संवेदनशील स्थानों पर अतिरिक्त पुलिस बल की तनाती की गई थी। पर्व को शांतिपूर्ण एवं सौहार्दपूर्ण माहौल में संपन्न कराने के लिए पुलिस द्वारा लगातार सभी थाना क्षेत्रो में धार्मिक स्थलों के आसपास भ्रमणशील रहते हुए अवांछिनिय तत्वों पर सतर्क दृष्टि रखी गयी। ईद-उल-जुहा जिसे आम बोलचाल में बकरीद कहा जाता है, इस्लाम धर्म का सबसे प्रमुख और पवित्र त्योहार है। यह मुख्य रूप से त्याग, बलिदान और अल्लाह के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक है। यह त्योहार हज़रत इब्राहीम (अब्राहम) द्वारा दी गई महान कुर्बानी की याद में मनाया जाता है। मान्यता के अनुसार, अल्लाह ने उनकी परीक्षा लेने के लिए उन्हें अपने सबसे प्रिय पुत्र इस्माइल की कुर्बानी देने का हुक्म दिया था। जैसे ही हज़रत इब्राहीम अपने बेटे की कुर्बानी देने लगे, अल्लाह ने उनकी निष्ठा से प्रसन्न होकर उनके पुत्र को जीवनदान दे दिया और उनकी जगह एक दुम्बे (भेड़) की कुर्बानी हो गई। इस दिन आर्थिक रूप से सक्षम मुसलमान बकरे, भेड़ या अन्य जायज़ जानवर की कुर्बानी देते हैं। कुर्बानी के गोश्त को तीन बराबर हिस्सों में बांटा जाता है- एक हिस्सा परिवार के लिए, दूसरा रिश्तेदारों/दोस्तों के लिए, और तीसरा हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों में बाँट दिया जाता है। इस मुबारक दिन की शुरुआत सुबह ईदगाह या मस्जिदों में विशेष सामूहिक नमाज अदा करके होती है। इस त्योहार का मुख्य संदेश यही है कि इंसान अपनी सबसे प्यारी चीज़ भी ईश्वर की राह में और इंसानियत की भलाई के लिए न्यौछावर करने को तैयार रहे।