विकास रावत: शौक से मशरूम की खेती, फिर ‘मशरूम हंटर’ तक का सफर
‘द हाउस ऑफ मशरूम’ की कहानी—जिज्ञासा से जुनून और जुनून से पहचान तक
कहते हैं कि मशरूम अंधेरे और खामोशी में पनपता है, लेकिन जब सामने आता है तो अपनी अलग पहचान छोड़ जाता है। विकास रावत की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। एक जिज्ञासा से शुरू हुआ सफर आज उन्हें ‘द हाउस ऑफ मशरूम’ के संस्थापक और अनुभवी मशरूम हंटर के रूप में पहचान दिला रहा है। इस मुकाम के पीछे वर्षों की मेहनत, असफलताओं से मिली सीख, धैर्य और प्रकृति के प्रति गहरा लगाव छिपा है।
जिज्ञासा से हुई शुरुआत
विकास रावत की मशरूम की खेती से जुड़ी यात्रा करीब वर्ष 2014 के आसपास शुरू हुई। उस समय मशरूम की खेती को लेकर जागरूकता सीमित थी। उनके मन में एक सवाल उठा—जब मशरूम जंगलों में प्राकृतिक रूप से उग सकता है, तो सही परिस्थितियां बनाकर इसे इंसान क्यों नहीं उगा सकता?
यही सवाल उनकी प्रेरणा बन गया। उन्होंने किताबों और विशेषज्ञों से जानकारी हासिल की, प्रशिक्षण लिया और एक छोटे से कमरे में ऑयस्टर मशरूम यानी ढींगरी के कुछ बैग लगाकर प्रयोग शुरू किया।
पहली असफलता बनी पहली सीख
शुरुआती दौर आसान नहीं था। कई बैग संक्रमित हो गए। कभी नमी का संतुलन बिगड़ा तो कभी तापमान अनुकूल नहीं रहा। आसपास के लोगों ने भी सवाल उठाए, लेकिन विकास ने प्रयास जारी रखा।
विकास के अनुसार, “मशरूम ने मुझे सबसे पहले धैर्य सिखाया। इसे जबरदस्ती नहीं उगाया जा सकता। हमें सिर्फ सही वातावरण तैयार करना होता है—सफाई, नमी और तापमान का ध्यान रखना होता है। इसके बाद प्रकृति अपना काम करती है।”
हर असफलता ने उन्हें नई सीख दी। धीरे-धीरे उत्पादन बढ़ा, गुणवत्ता में सुधार आया और ग्राहकों का भरोसा भी मजबूत होता गया।
खेती से जंगलों तक पहुंचा सफर
मशरूम की खेती का अनुभव बढ़ने के साथ विकास की दिलचस्पी जंगली मशरूम की दुनिया में बढ़ी। वे हिमालयी जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में जाने लगे। स्थानीय मशरूम हंटरों के साथ समय बिताकर उन्होंने पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक जानकारी को समझना शुरू किया।
उन्होंने जाना कि अलग-अलग मशरूम किस मौसम में, किस तरह के पेड़ों के आसपास और किस प्रकार की मिट्टी में उगते हैं। साथ ही उन्होंने यह भी समझा कि जंगली मशरूम की पहचान में सावधानी कितनी जरूरी है, क्योंकि कुछ प्रजातियां विषैली भी हो सकती हैं।
विकास कहते हैं, “जंगल सबसे बड़ा शिक्षक है। वहां जल्दबाजी नहीं चलती। मशरूम हंटर वर्षों तक एक ही जंगल में लौटते हैं और हर बार कुछ नया सीखते हैं।”
यही अनुभव धीरे-धीरे उन्हें एक मशरूम किसान से ‘मशरूम हंटर’ की पहचान तक ले गया।
‘द हाउस ऑफ मशरूम’ बना पहचान
अपने अनुभव और जुनून को एक संस्थागत पहचान देने के उद्देश्य से विकास रावत ने ‘द हाउस ऑफ मशरूम’ की स्थापना की। यहां ऑयस्टर मशरूम के उत्पादन के साथ लोगों को मशरूम की खेती के प्रति जागरूक करने पर भी जोर दिया जाता है।
विकास का मानना है कि मशरूम की खेती किसानों और युवाओं के लिए आय का एक विकल्प बन सकती है। इसमें पारंपरिक खेती की तुलना में कम भूमि की आवश्यकता हो सकती है और भूसा, पराली तथा अन्य कृषि अवशेषों का उपयोग उत्पादन में किया जा सकता है।
युवाओं और किसानों को संदेश
विकास रावत युवाओं को संदेश देते हैं कि शुरुआत छोटी हो सकती है, लेकिन लक्ष्य बड़ा होना चाहिए। उनके शब्दों में, “मशरूम की तरह जिंदगी में भी असली विकास तब होता है, जब कोई देख नहीं रहा होता। शुरुआत छोटी करें, हर गलती से सीखें और लगातार मेहनत करते रहें।”
वहीं किसानों को उनकी सलाह है कि मशरूम की खेती शुरू करने से पहले उचित प्रशिक्षण और तकनीकी जानकारी जरूर हासिल करें। खासकर जंगली मशरूम के मामले में विशेषज्ञ की पहचान के बिना किसी मशरूम का सेवन नहीं करना चाहिए।
विकास रावत की कहानी इस बात की मिसाल है कि एक छोटी-सी जिज्ञासा, यदि लगातार सीखने और मेहनत से जुड़ जाए, तो वह धीरे-धीरे जुनून और फिर एक अलग पहचान में बदल सकती है।
